अध्याय ८: नई शुरुआत और छुपी पहचान
दिव्याक्षी, जो कभी नागलोक की सबसे शक्तिशाली नागिन हुआ करती थी, अब एक साधारण महिला 'चंदा' बनकर गांव में रह रही थी। उसकी असलियत से अंजान गांव वाले उसे एक सामान्य स्त्री समझते थे, जिसने नेत्रा नामक एक अनाथ बच्ची को गोद लेकर अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था। दिव्याक्षी ने नेत्रा को अपने दिल से लगाया और उसकी परवरिश ऐसे की, जैसे वह उसकी ही सगी बेटी हो। वह उसे हर वो सुख-सुविधा देती, जो एक माँ अपनी संतान को दे सकती है। परंतु, उसके भीतर एक रहस्यमयी बेचैनी छिपी हुई थी, जो उसे कभी चैन नहीं लेने देती थी। गांव वालों की नजर में वे एक खुशहाल परिवार थे, पर दिव्याक्षी के दिल में एक गहरी बेचैनी छिपी हुई थी।
समय बीतता गया, और कुछ महीनों बाद, जब दिव्याक्षी गर्भवती नागिन के रूप में अपने प्रसव का पूर्वाभास पाने लगी, एक अजीब सी हलचल उसके भीतर जाग उठी। उसे यह महसूस होने लगा कि उसकी नागिन शक्तियां फिर से जागृत हो रही हैं, और वह अपने गर्भ में कुछ अलौकिक का अनुभव करने लगी। जैसे-जैसे उसका शरीर परिवर्तित हो रहा था, उसकी चिंता बढ़ती जा रही थी कि उसकी असली पहचान कहीं उजागर न हो जाए। एक रात, जब पूरा गांव चांदनी की रौशनी से जगमगा रहा था, अचानक नागराज वज्राक्ष ने दिव्याक्षी को सतर्कता से नागलोक ले जाने का निर्णय लिया।
नागलोक के रहस्यमयी वातावरण में, दिव्याक्षी को नयनतारा के पवित्र कक्ष में लाया गया, जहां वर्षों से नयनतारा ध्यानमग्न थी। वहां दिव्याक्षी ने सौ अलौकिक अंडों को जन्म दिया, जिनमें अद्भुत शक्तियां भरी हुई थीं। नयनतारा, जो अपने तप से प्रबल हो चुकी थी, ने अपनी दिव्य ऊर्जा से दिव्याक्षी की प्रसव पीड़ा को हर लिया। जैसे ही सौ अंडों का जन्म हुआ, नयनतारा का सौ वर्षों का तप फलित हुआ, और उसकी चट्टान जैसी जड़ मूर्ति का स्वरूप बदलने लगा। नयनतारा की आँखें खुल गईं, और उसकी चट्टान जैसी मूर्ति जीवंत हो उठी। उसकी गूंजती हुई शक्तिशाली आवाज पूरे नागलोक में फैल गई, "इन अंडों को यहीं मेरे संरक्षण में छोड़ दो। भोलेनाथ की कृपा से ये सुरक्षित रहेंगे। तुम दोनों अपने कर्तव्यों का पालन करो। मेरा आशीर्वाद नागवंश पर सदा रहेगा।"
दिव्याक्षी और वज्राक्ष ने नयनतारा के सामने मस्तक झुकाकर नयनतारा को प्रणाम करके, वापस तारापुर गांव लौट आए। गांव में पहुंचने पर दोनों ने फिर से अपनी मानव रूपी पहचान धारण कर ली, ताकि गांव वालों को कोई संदेह न हो। लेकिन दिव्याक्षी के मन में अब एक गहरा भय घर कर गया था। वह हर समय इस सोच में डूबी रहती कि कहीं उसकी नागिन की असली पहचान उजागर न हो जाए, खासकर नेत्रा को उससे सुरक्षित कैसे रखा जाए। प्रसव के बाद दिव्याक्षी की कुछ शक्तियां कमजोर हो गई थीं, और उसे यह चिंता सताने लगी कि नेत्रा कहीं उसकी असली पहचान से घबरा न जाए। उसकी कुछ शक्तियाँ कमजोर हो गई थीं, जिससे उसका डर और भी बढ़ गया था।
दूसरी तरफ, वज्राक्ष अपने नागलोक के राजकीय कर्तव्यों में व्यस्त था, लेकिन उसका ध्यान हमेशा दिव्याक्षी और नेत्रा की सुरक्षा पर भी था। वह गुप्त रूप से उनकी सुरक्षा का ध्यान रखता था, क्योंकि नागलोक में कुछ नागों के बीच असंतोष था। उसे पता था कि नागलोक के कुछ नाग इस बात से असंतुष्ट थे कि एक मानव बच्ची को नागिन पाल रही है। उन्हें डर था कि एक मानव बच्ची को पालने से नागलोक के नियम भंग हो सकते हैं, जिससे भविष्य में भयंकर परिणाम सामने आ सकते हैं। यदि नागलोक के प्राचीन नियमों का उल्लंघन होता है तो इससे भविष्य में अनहोनी हो सकती है। वज्राक्ष ने चुपचाप उनकी सुरक्षा का जिम्मा लिया और बिना किसी को खबर हुए, वह उन्हें दूर से सुरक्षित रखने की कोशिश करता रहा।
समय बीतता गया और नागलोक में दिव्याक्षी के सौ अंडों से अद्भुत शक्तियों से युक्त शक्तिशाली नाग-नागिनों का जन्म हुआ। नयनतारा की छत्रछाया के संरक्षण में वे तेजस्वी रूप से वे तेजी से बढ़ने लगे और अपनी अलौकिक शक्तियों का विकास करने लगे। दिव्याक्षी छिपकर अपने बच्चों से मिलने जाती, लेकिन हर बार उसका दिल भारी हो जाता। एक माँ की ममता और अपनी असल पहचान छिपाने का दर्द उसे भीतर से तोड़ रहा था। लेकिन कर्तव्य और नेत्रा के प्रति प्रेम दिव्याक्षी को पुनः सशक्त कर देता।
नेत्रा अब पाँच साल की हो चुकी थी। एक दिन जब वह गांव के अन्य बच्चों के साथ जंगल के पास खेल रही थी, अचानक गांव में एक भयावह घटना घटी। एक विशालकाय अजगर जंगल से निकलकर गांव की ओर बढ़ने लगा। उसकी विशाल शरीर की आहट से धरती कांपने लगी, और गांववालों की चीखें पूरे वातावरण में गूंज उठीं और वे दहशत में इधर-उधर भागने लगे। अजगर की लाल आंखें कुछ खोज रही थीं, और वह सीधा नेत्रा की ओर बढ़ता चला गया, मानो वह किसी विशेष लक्ष्य की ओर खींचा जा रहा हो। जैसे उसे कुछ विशेष संकेत मिल रहे हों। उसकी आँखों में गहरा लाल रंग चमकने लगा, जो नेत्रा के चारों ओर मंडराता हुआ दिखाई दे रहा था।
दिव्याक्षी, जो दूर से यह सब देख रही थी, का दिल जोर से धड़क उठा। वह जानती थी कि अजगर का इरादा क्या था, और उसकी नागिन शक्तियां फिर से जागृत होने लगीं, लेकिन उसे अपनी पहचान को भी छिपाए रखना था। नेत्रा की सुरक्षा उसकी पहली प्राथमिकता थी, पर अपने अस्तित्व को बचाने की चुनौती भी सामने थी। अपने सोच के द्वंद्व को एक तरफ करते हुए दिव्याक्षी नेत्रा की रक्षा करने पहुंची क्योंकि वह जान चुकी थी कि वह एक मायावी अजगर है। जैसे ही अजगर नेत्रा के करीब पहुंचा, दिव्याक्षी ने अपनी शक्तियों को समेटकर पूरे बल से उस विशाल अजगर का सामना किया। उसकी आँखों से एक दिव्य प्रकाश फूटा और अजगर को स्थिर कर दिया। उसकी आँखों में जो नागिन की शक्ति थी, वह अजगर ही नहीं बल्कि किसी भी जीव को स्थिर कर देती थी। उसने नेत्रा के चारों ओर एक दिव्य प्रकाश फैलाया, जिसने अजगर को रोक दिया।
अजगर ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन दिव्याक्षी की नागिन शक्तियों ने उसे जकड़ लिया था। दिव्याक्षी उस मायावी अजगर पर अधिक शक्ति का प्रयोग नहीं करना चाहती थी इसीलिए उसने ने धीरे से एक प्राचीन मंत्र फूंका और अजगर को वज्राक्ष के पास नागलोक भेज दिया। गांववालों ने इस अद्भुत घटना को देखा और उनकी आंखों में सवाल उठने लगे। कैसे एक साधारण महिला 'चंदा' इतनी शक्तिशाली हो सकती है? यह घटना गांववालों के दिलों में एक गहरी जिज्ञासा जगा गई थी। गांववाले एक-दूसरे से फुसफुसाने लगे— "चंदा कौन है? उसने एक साधारण महिला होते हुए इतनी दिव्य शक्तियों का प्रदर्शन कैसे किया?" गांव में फुसफुसाहट तेज हो रही थी, और अब दिव्याक्षी का डर सच्चाई में बदलने लगा। उसकी पहचान की परतें धुंधली हो रही थीं, और उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि इस रहस्य को कैसे संभाले। गांव में फुसफुसाहटें बढ़ने लगीं, और दिव्याक्षी को महसूस हुआ कि उसकी पहचान अब और अधिक समय तक छिपी नहीं रह सकती।
इस घटना ने दिव्याक्षी को मजबूर कर दिया कि वह वज्राक्ष को संदेश भेजे। उसने संकेत किया, "अब समय आ गया है कि हम कुछ बड़ा निर्णय लें।"


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें