अध्याय ७: दिव्याक्षी और वज्राक्ष: रहस्यमयी दाम्पत्य जीवन

दिव्याक्षी अपने अंतर्ज्ञान से भांप चुकी थी कि उस बच्ची की मृत माॅं की कहानी साधारण नहीं थी। वह एक गरीब महिला थी, जो अपने छोटे से गांव तारापुर में अपनी निर्दयी सास के साथ रहती थी। दुर्भाग्य ने उसे तब घेर लिया था, जब उसके पति की नदी में डूबने से मृत्यु हो गई थी, जब वह तीन महीने की गर्भवती थी, लेकिन उसका शव कभी नहीं मिला और यहीं से शुरू हुआ उसकी बर्बादी का सिलसिला। अपने दिव्य चक्षुओं से दिव्याक्षी ने देखा कि उस औरत के ससुराल वालों ने उसे और उसकी अजन्मी संतान को अशुभ मानकर घर से निकाल दिया। दिव्याक्षी का हृदय तेज़ धड़कने लगा था। 


उसकी दिव्य दृष्टि ने उसे जो दृश्य दिखाया था, वह किसी साधारण इंसानी पीड़ा से कहीं अधिक था। वह महिला, जिसे पूरे गांव ने अपशगुनी करार दिया था, एक भयंकर त्रासदी से गुजरी थी। उसका पति, शेखर, नदी की धारा में डूबकर शायद कहीं बह गया था, लोगों ने बहुत ढूंढा मगर उसकी लाश कभी नहीं मिली थी। गांव में कोई उसे सांत्वना देने भी नहीं आया था, और उसकी सास तथा परिवार के बाकी सदस्यों ने तो उसे उसी दिन से अशुभ और शापित मान लिया था। प्रसव के बाद उसकी गोद में एक मासूम बेटी आ गई थी, लेकिन कोई उसे अपनाने को तैयार नहीं था। समाज ने भी उसे धिक्कार दिया था। उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दुख तब आया जब उसे अपने भाई द्वारा मायके से भी निकाल दिया गया। वह अपनी नवजात बेटी नेत्रा को गोद में लिए दर-दर भटकने लगी, लेकिन गांववालों की नजरों में वह सिर्फ एक अभागी औरत थी।

नागराज वज्राक्ष और दिव्याक्षी, नागलोक से आए दिव्य युगल, जिन्होंने उस महिला की आत्मा की पुकार सुनी थी, उसके दुख को महसूस कर सकते थे। इस अनसुनी, अनदेखी पीड़ा को जानकर दिव्याक्षी और नागराज वज्राक्ष का हृदय कांप उठा। उनके पास सिर्फ शक्तियां नहीं थीं, बल्कि एक दिव्य कर्तव्य भी था - न्याय करना। उन्होंने उस मृत महिला का ऋण चुकाने का प्रण किया। अब वज्राक्ष और दिव्याक्षी, चंदा और शेखर के रूप में गांव वापस लौटने का निश्चय कर चुके थे। वे जानते थे कि इस मासूम महिला और उसकी बेटी को न्याय दिलाने का केवल एक ही तरीका था: वे खुद को उस महिला और उसके मृत समझे जाने वाले पति के रूप में ढालकर गांव लौटें। 

नागराज ने अपनी शक्तियों से शेखर का रूप धारण किया और दिव्याक्षी ने चंदा का। अब उनका लक्ष्य साफ था—गांव लौटकर उस मृत महिला को सम्मान के साथ उसके समाज में स्थान दिलाकर उसकी बेटी नेत्रा की जिंदगी फिर से संवारनी थी। इस प्रक्रिया में दोनों नाग दम्पति पति-पत्नी के समान साथ रहकर नेत्रा को माता-पिता का प्यार भी दे सकेंगे। वे जानते थे कि यह सरल नहीं होगा, लेकिन नागशक्ति की माया में ऐसा कोई काम असंभव भी नहीं था। लेकिन यह सफर जितना दिखने में आसान था, उतना था नहीं।


जब "शेखर" और "चंदा" गांव पहुंचे, तो गांव में सनसनी फैल गई, मानो समय थम सा गया। लोग अवाक थे, शेखर, जिसे सभी मृत मान चुके थे, अचानक गांव के दरवाजे पर खड़ा था। उसकी वापसी एक चमत्कार की तरह लग रही थी। गांववालों की आंखों में अविश्वास था, लेकिन शेखर ने बड़ी कुशलता से अपनी कहानी गढ़ी। शेखर ने अपनी वापसी की कहानी बुनते हुए कहा, "मुझे मछुआरों ने बचा लिया था। मैं कई दिनों तक भटकता रहा, बिना साधनों के। इसीलिए लौटने में इतनी देर हो गई।" उसकी कहानी इतनी विश्वसनीय थी कि किसी ने उस पर शक नहीं किया। उसकी बातों में सच्चाई की झलक थी, और लोग उसकी कहानी को सच मान गए। गांववाले अब शेखर की वापसी को भगवान की कृपा मानने लगे थे। कुछ ही देर में यह खबर पूरे गांव में फैल गई, और वह स्त्री, चंदा,  जिसे अशुभ मानकर गांव से निकाल दिया गया था, अब सभी गांववालो की नजर में सबसे शुभ महिला बन गई। उसका नाम अब मान-सम्मान के साथ लिया जाने लगा।

शेखर की मां, जिसने अपनी बहू को घर से निकाल दिया था, अब अपनी गलती पर पछता रही थी। उसने रोते हुए अपनी बहू से माफी मांगी और उसे फिर से अपने घर में वापस बुलाया। गांववालों ने नेत्रा, उस मासूम बच्ची, को भी अब शुभ मानना शुरू कर दिया। पहले जो बच्ची अपशगुनी समझी जाती थी, अब वह पूरे गांव की आंखों का तारा बन गई थी। दिन के उजाले में सब कुछ ठीक लगने लगा था, लेकिन रात आते ही एक भयानक सच्चाई सामने आती थी। यह सारा परिवार वालो के बीच मनुष्य रूपी खेल दिन के उजाले में ही संभव था। रात का अंधेरा एक भयानक सच को छिपाए हुए था। शेखर और चंदा कोई साधारण मनुष्य नहीं थे। वे नागलोक के दिव्य नाग-नागिन थे, और हर रात उन्हें कुछ घंटों के लिए अपने असली नाग रूप में बदलना पड़ता था। यह उनके जीवन की सबसे बड़ी चुनौती थी। उन्हें यह ध्यान रखना होता था कि कोई उनकी इस रहस्यमयी प्रक्रिया को न देख सके। एक गलती और पूरा सच उजागर हो सकता था। हर रात, जैसे ही चंद्रमा आसमान में अपनी चांदनी बिखेरता, वे अपने असली नाग रूप में लौट आते थे। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा खतरा था — वे सतर्क थे कि किसी को भी उनके इस रहस्य का पता न चले।

हर रात उन्हें इस बात का ध्यान रखना पड़ता कि कोई उनकी इस रूपांतरण प्रक्रिया को न देख सके। यह डर उन्हें हर रात सताता था। वज्राक्ष ने यह तय किया कि वह अब दूरी बनाए रखेगा। वज्राक्ष ने इस मुश्किल का समाधान निकालने के लिए शेखर के रूप में गांव छोड़ने का निर्णय लिया। उसने अपने परिवार तथा गांववालों से कहा, "मुझे काम के सिलसिले में शहर जाना होगा। मैं कुछ महीनों में वापस आता रहूंगा।" लेकिन असल में वह नागलोक से दिव्याक्षी और नेत्रा की निगरानी करता रहेगा। उसे डर था कि कहीं उसकी अनुपस्थिति में कोई बड़ा हादसा न हो जाए।

 
समय बीतने के साथ नेत्रा बड़ी होने लगी। उसकी मासूमियत में एक गहरी और रहस्यमयी शक्ति छिपी हुई थी। दिव्याक्षी ने महसूस किया कि उसकी बेटी में भी नागशक्ति की अद्भुत क्षमताएं जन्म ले रही थीं। इसी बीच, दिव्याक्षी गर्भवती हो गई थी। परंतु अपनी दिव्य शक्तियों का उपयोग कर उसने इस बात को छिपाए रखा, ताकि गांववालों को उसकी असली पहचान का पता न चले। वज्राक्ष और दिव्याक्षी अपनी आने वाली संतान के लिए बेहद उत्साहित थे, पर उनकी खुशी के साथ चिंता की लहरें भी उठने लगीं। उनके मन में डर भी था। 

वज्राक्ष और दिव्याक्षी को पता था कि उनकी संताने साधारण नहीं होगी। उनका जन्म और जीवन उनके लिए नई चुनौतियां लेकर आएगा। इस रहस्यमय जीवन में हर दिन एक नई चुनौती थी, और उनकी सुरक्षा अब केवल उनके रहस्यों पर निर्भर थी। दुनिया के सामने चंदा और शेखर का जीवन एक साधारण दंपति का प्रतीत होता था, लेकिन इस मुखौटे के पीछे एक ऐसा रहस्य छिपा था, जिसे कोई समझ नहीं सकता था। हर रात, हर पल, वे अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे थे। उन्हें पता था कि इस सफर में केवल एक-दूसरे का साथ ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

दिन में शांति और सुख का आवरण ओढ़े यह दंपति, रात में नागलोक के प्राचीन नियमों और शक्तियों के बीच संघर्ष कर रहा था। चंदा और शेखर का जीवन जितना सरल और साधारण दिखाई देता था, उतना ही रहस्यमय और पेचीदा था। वे दोनों जानते थे कि इस नाटक में केवल एक-दूसरे का साथ ही उन्हें हर मुश्किल से उबार सकता है। 

एक रात, जब गांव में सब सो रहे थे, वज्राक्ष ने दिव्याक्षी से कहा, "हमें सतर्क रहना होगा। यह दुनिया हमारी नहीं है, और यहां हर कदम सोच-समझकर रखना होगा।" दिव्याक्षी ने सहमति में सिर हिलाया, उसकी आंखों में चिंता की लकीरें थीं। उसे पता था कि उनकी सबसे बड़ी परीक्षा अभी बाकी थी—अपनी असली पहचान को छिपाकर इस दुनिया में अपने अस्तित्व को बनाए रखना, और अपनी मानव-बेटी नेत्रा से भी अपने नागलोक के संबंध को छुपाना। 

उनके जीवन में हर दिन एक नई चुनौती थी। एक छोटी सी गलती से सब कुछ तबाह हो सकता था। मगर इस खेल में हारने का सवाल ही नहीं था। वे नागराज और नागरानी थे, और उनका साहस और प्रेम ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

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