अध्याय ६: त्याग और करुणा का बंधन


एक दिन नागराज वज्राक्ष, अपने अपार सामर्थ्य और अलौकिक शक्तियों के साथ पूरे जंगल और आस-पास के गाँवों की निगरानी कर रहा था। रोज की तरह उसका जीवन जंगलों और गाँवों की सुरक्षा करने में बीत रहा था। उस दिन जब वह अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए नागलोक के आसमान से पूरी भूमि का मुआयना कर रहा था, तभी उसे दूर से एक दर्द भरी चीख सुनाई दी और साथ में उसने एक रोते हुए बच्चे की आवाज़ सुनी। उसने झट से नीचे की ओर ध्यान केंद्रित किया और अपनी अलौकिक शक्तियों से उसने देखा कि एक नवजात बच्ची नदी के किनारे रो रही थी| दृश्य बेहद ह्रदय विदारक था—एक औरत, जो नदी से पानी पी रही थी, को एक सांप ने काट लिया था, और उसकी वहीं मृत्यु हो चुकी थी। उसके बगल में उसकी मासूम बच्ची पड़ी हुई थी, जो जोर-जोर से रो रही थी। 


अपनी अद्वितीय शक्तियों का उपयोग करते हुए वह तुरंत वहां पहुंचा जहां नदी के किनारे वो नवजात बच्ची बिलख रही थी, उसकी चीखें आसमान को चीर रही थीं। लेकिन उससे भी भयंकर दृश्य जो वज्राक्ष ने देखा, वह था पास ही पड़ी एक औरत का निर्जीव शरीर। उसकी आँखें अब भी खुली थीं, मानो आखिरी क्षणों में वह अपनी बच्ची की रक्षा करने के लिए संघर्ष कर रही हो। वज्राक्ष समझ रहा था कि यह औरत मर चुकी है और उसकी गोद में मासूम बच्ची भूख से तड़प रही है।  


वज्राक्ष का हृदय उस बच्ची की स्थिति देखकर पिघल गया। बिना किसी विलम्ब के, वज्राक्ष अपने नाग रूप से मानव रूप में बदल गया और तेजी से उस बच्ची के पास पहुँचा। उसने बच्ची को गोद में उठाया, लेकिन उसकी करुण पुकारें थमने का नाम नहीं ले रही थीं। बच्ची का चेहरा पीला पड़ गया था और उसके होंठ सूख चुके थे। बच्ची का रोना बंद नहीं हुआ। वज्राक्ष समझ गया कि बच्ची भूख से व्याकुल है। तभी उस बच्ची की आवाज़ दिव्याक्षी के कानों तक पहुंची। वज्राक्ष ने चारों ओर देखा कि शायद कोई मदद मिल जाए, लेकिन जंगल की नीरवता में केवल उसकी पदचापें ही सुनाई दे रही थीं। वह समझ गया कि अब उसे ही इस बच्ची की जिम्मेदारी उठानी होगी।


वह बच्ची को अपने आलिंगन में लेकर आकाश की ओर देख रहा था, तभी उसकी सहायता के लिए दिव्याक्षी प्रकट हुई और उसने अपनी शक्ति से उस बच्ची को नागलोक का विशेष अमृत पिलाया। दिव्याक्षी की शक्तियों का विस्तार असीम था, और वह  समय-समय पर वज्राक्ष की सहायता करती रहती थी। अमृत के प्रभाव से बच्ची की भूख-प्यास तथा सारे कष्टों से निवारण हो गया, लेकिन माँ के मृत्यु का दर्द कम नहीं हो सकता। दिव्याक्षी ने बच्ची की स्थिति को देखा और गंभीर स्वर में कहा, "इस निर्दोष बच्ची के साथ जो अन्याय हुआ है और इसकी माँ की मृत्यु अस्वीकार्य है। उसका प्रायश्चित होना चाहिए। दोषी को दंडित करना होगा और इस बच्ची का समुचित देखभाल होनी चाहिए।"


इतने में एक काला, भयानक सांप जिसने उस औरत को काटा था, वज्राक्ष और दिव्याक्षी के सामने कांपता और सिर झुकाते हुआ आया। नागराज वज्राक्ष के भय से उसका सिर धरती तक झुका हुआ था, और उसकी आवाज कांप रही थी। उसने डरते हुए अपनी सफाई में कहा, "यह सब मेरी गलती नहीं थी, बल्कि एक दुर्घटना थी। उस औरत ने अनजाने में मेरे पूंछ पर पैर रख दिया, और गुस्से में आकर मैंने उसे काट लिया। मेरी मंशा उसे मारने की नहीं थी।" 


उसकी सफाई सुनकर वज्राक्ष का चेहरा कठोर हो गया। उसने अपनी प्रचंड आवाज में कहा, "दुर्घटना हो या नहीं, परंतु तुम्हारा यह कृत्य अक्षम्य है। तुमने एक मासूम जीवन छीन लिया है। अब तुम्हारा यह विष तुम्हारे लिए अभिशाप बन जाएगा। आज से तुम्हारा सारा विष समाप्त कर दिया जाता है और तुम कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचा पाओगे। अब तूम किसी को अपने काटने से मार नहीं सकोगे। तूम केवल छोटे जीवों और अंडों पर निर्भर रहकर जीवित रहोगे।"



वज्राक्ष ने अपनी न्यायिक दृष्टि से यह भी तय किया कि नागलोक को अब इस बच्ची की देखभाल करनी होगी, क्योंकि उसका जीवन एक नाग के कारण संकट में आया था। वज्राक्ष ने यह आदेश दिया कि उस महिला की मौत के बदले नागलोक इस बच्ची की देखभाल करेगा। सभी नागों ने सिर झुका कर इसे स्वीकार कर लिया। लेकिन सवाल यह था कि नागलोक के निवासी एक मानव बच्ची की परवरिश कैसे करेंगे? यह एक गूढ़ समस्या थी, जिसे हल करना अत्यंत महत्वपूर्ण था। 


वज्राक्ष सोच में डूबा हुआ था। उसके मन में एक प्रश्न उठ खड़ा हुआ—"हम नाग होकर इस मानव बच्ची की परवरिश कैसे करेंगे?" तभी दिव्याक्षी ने प्रस्ताव दिया। उसने वज्राक्ष की ओर देखते हुए कहा, "मैं इस बच्ची की माँ बनूँगी। मैंने वर्षों तक आप को पति रूप में प्राप्त करने हेतु तपस्या की है और इस तपस्या से असीम शक्तियाँ प्राप्त की हैं। लेकिन इस मासूम की खातिर, मैं उन शक्तियों से उसके लिए सदा मनुष्य रूप में रहने को तैयार हूँ। अगर अगले जन्म में पुनर्मिलन का अवसर मिला, तो मैं तुम्हें पुनः पाने का प्रयास करूंगी।"

दिव्याक्षी का यह बलिदान अप्रत्याशित था। उसने अपने जीवन की सबसे बड़ी इच्छा — वज्राक्ष को अपना जीवनसाथी बनाने की आशा — को इस बच्ची के जीवन के लिए त्यागने का निर्णय लिया था। वज्राक्ष यह सुनकर चकित रह गया और उसकी आँखों में दिव्याक्षी के प्रति आदर तथा प्रेम और गहरा हो गया। उसने दिव्याक्षी से विवाह का प्रस्ताव रखा और कहा, "तुम्हारा यह त्याग सराहनीय है। तुम्हारे इस महान त्याग के आगे मेरा सिर झुक गया है। तुम मेरे हृदय में पहले से ही विशेष स्थान रखती हो, लेकिन अब मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी पत्नी बनो और हम साथ मिलकर इस बच्ची को एक नया जीवन देंगे।" 

दिव्याक्षी ने वज्राक्ष का प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया और नागलोक के परंपरागत रीति से वज्राक्ष और दिव्याक्षी का विवाह सम्पन्न हुआ। लेकिन विवाह के तुरंत बाद उसने कहा कि यहां के नियमानुसार ये बच्ची नागलोक में नहीं रह सकती इसलिए वह गाँव में एक साधारण मानव महिला बनकर रहेगी ताकि बच्ची को यह कभी पता न चले कि उसकी माँ एक नागिन है। उसने अपनी शक्तियों से उस बच्ची की मृत माता का रूप धारण कर लिया। दिव्याक्षी ने अपना रूप बदलकर उस बच्ची की माँ बन गई, और गांव में उसे मानव की तरह पालने के लिए जाने लगी। उसका सारा जीवन अब उस बच्ची की देखभाल में ही बीतने वाला था। वज्राक्ष ने उसे हर कदम पर साथ देने का वचन दिया और नागलोक के समस्त नागों को आदेश दिया कि वह इस बच्ची की सुरक्षा और देखभाल में मदद करें।

वज्राक्ष भी समय-समय पर अदृश्य रूप में उसकी मदद करने का वचन दिया, लेकिन उसका दिल यह देखकर तड़प रहा था कि उसकी पत्नी दिव्याक्षी नागलोक से दूर मनुष्यों के बीच गांव में रहने जा रही है। दोनों ने एक गहरी प्रतिज्ञा की थी—वे इस बच्ची को एक बेहतर जीवन देंगे, भले ही इसके लिए उन्हें किसी भी प्रकार का बलिदान क्यों न देना पड़े। वज्राक्ष और दिव्याक्षी के इस त्याग और प्रेम की कहानी नागलोक और मानवों के बीच प्रेम और करुणा का प्रतीक तो बन गई लेकिन इन सबका आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण होगा। 


वज्राक्ष और दिव्याक्षी के लिए यह त्याग और विरह सहना आसान नहीं था इसलिए उन्होंने विचार किया कि कोई ऐसा तरीका निकालें की वे तीनों परिवार की तरह एक साथ रहें। मानव माता-पिता के समान एक घर में अपनी ममता और प्यार से बच्ची को मिलकर बड़ा करें। वे दिन-रात उस बच्ची का ध्यान रखे और उसकी हंसी-खुशी में अपना सब कुछ भूल जाए।


भविष्य में उन दोनों को कई चुनौतियों का सामना करना था। वो जानते थे कि गाँव के लोग दिव्याक्षी को संदिग्ध दृष्टि से देखने लगेंगे और अमृत पीने के कारण उसकी बेटी की असाधारण विशेषताएँ धीरे-धीरे प्रकट होने लगेगी। बच्ची में कुछ ऐसी शक्तियाँ जाग्रत होंगी, जो सामान्य मानव बच्चों में नहीं होतीं। यह नागलोक और मानव संसार के बीच एक नई कहानी का आरंभ था, जिसमें प्रेम, त्याग और रहस्य की परतें धीरे-धीरे खुलने वाली थीं। 


वज्राक्ष और दिव्याक्षी ने अपनी इंद्रियों से उस बच्ची के संपूर्ण भूत-भविष्य जानने का प्रयास किया। वह बच्ची कौन है? क्या है उसका अतीत? और भविष्य में नागलोक से इसका कौनसा अध्याय जुड़ने वाला है।

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