अध्याय २१: नेत्रा की शादी
नेत्रा के विवाह का दिन नागलोक और मानव संसार, दोनों के लिए विशेष था। सूर्य की पहली किरण के साथ, नागलोक में उल्लास की लहर दौड़ पड़ी। नेत्रा, जो नागलोक की रहस्यमयी मनुष्य रूपी दिव्य नागकन्या थी, आज अपनी मानवता के प्रेम, प्रकाश से विवाह करने जा रही थी। विवाह स्थल को ऐसा सजाया गया था मानो पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आया हो। रंग-बिरंगे फूलों की सुगंध और दीपों की झिलमिलाती रोशनी ने पूरे वातावरण को जादुई बना दिया था। नागलोक के सभी प्रतिष्ठित नाग और नागिन, जैसे नागदेवी नयनतारा, मानव रूप धारण कर इस खास मौके पर उपस्थित हुए थे। सभी रिश्तेदार, जो कभी नागलोक की सुरक्षात्मक सीमाओं से बाहर नहीं निकले थे, आज अपनी प्रिय नेत्रा के विवाह में भाग लेने के लिए धरती पर आए थे। उनके मन में गर्व और स्नेह था, लेकिन साथ ही कुछ अनजाना भय भी।
विवाह के संस्कार शुरू होते ही हर ओर से मंत्रोच्चार की मधुर ध्वनियाँ गूंजने लगीं। नेत्रा ने लाल और सोने के वस्त्र धारण कर रखे थे, जिसमें वह एक चमचमाती देवी सी प्रतीत हो रही थी। जब उसने प्रकाश के साथ सप्तपदी की रस्म निभाई, तो उसकी आँखों में अनेक भावनाएँ तैरने लगीं। एक तरफ उसकी नई जिंदगी का आगाज़ था, जिसमें प्रकाश के साथ एक नई दुनिया बसाने का सपना था, तो दूसरी ओर उसके मन के किसी कोने में एक अनजाना डर और बेचैनी थी। नागलोक छोड़कर एक साधारण मनुष्य के रूप में जीवन बिताने की कल्पना ने उसे विचलित कर दिया था। फिर भी, उसने खुद को संयमित रखा और अपने भीतर उठ रहे तूफान को किसी को महसूस नहीं होने दिया।
जैसे ही विवाह की रस्में समाप्त हुईं, नेत्रा को एहसास हुआ कि अब वह अपने ससुराल की ओर प्रस्थान करने वाली है। आंसू उसकी आँखों से अनायास ही बह निकले। वह अपने माता-पिता, अपने बचपन के क्षणों और नागलोक के विशाल किले की सुरक्षा को छोड़ रही थी। उसकी आत्मा को इन सब बातों से एक अजीब सा दर्द महसूस हो रहा था। लेकिन वह जानती थी कि उसे अब एक नई ज़िम्मेदारी उठानी थी। नागदेवी नयनतारा, जो हमेशा नेत्रा की मार्गदर्शक और संरक्षक रही थीं, ने उसे अपनी कक्ष में बुलाया। नयनतारा ने नेत्रा की आंखों में छिपी असुरक्षा को महसूस किया और उसे सांत्वना दी।
"नेत्रा," नयनतारा ने धीमे और स्नेहपूर्ण स्वर में कहा, "तुम्हारा यह नया जीवन बहुत सुंदर होगा, लेकिन चुनौतियों से भरा भी। परंतु तुम अकेली नहीं हो।" उन्होंने एक चमकती हुई दिव्य मूर्ति नेत्रा को सौंपी, जो नागलोक से लाई गई थी। "इस मूर्ति की पूजा करना और इसे अपने पूजा कक्ष में स्थापित करना। यह तुम्हें हर कठिनाई में शक्ति देगी।" नयनतारा की आंखों में विश्वास की चमक थी, जैसे उन्होंने नेत्रा को एक अभेद्य कवच सौंपा हो। यह मूर्ति मात्र एक प्रतीक नहीं थी; यह नागलोक का आशीर्वाद था, जो हर परिस्थिति में नेत्रा के साथ रहेगा। नेत्रा ने वह मूर्ति अपने दिल के करीब रख ली और नयनतारा के वचनों को अपने हृदय में गहराई से बसा लिया।
जब नेत्रा और प्रकाश अपने नए घर के लिए निकलने लगे, तो नेत्रा के मन में एक विचित्र शांति और सुरक्षा का अहसास था। हालाँकि नयनतारा और नागलोक के अन्य रिश्तेदार अब दृष्टि से ओझल हो गए थे, लेकिन नेत्रा को महसूस हो रहा था कि वे अदृश्य रूप में उसके साथ चल रहे थे। वह अकेली नहीं थी; नागलोक की समस्त शक्तियाँ उसके साथ थीं। प्रकाश के परिवार ने उनका भव्य स्वागत किया। हर कोई नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद देने के लिए उमड़ा पड़ा था। नेत्रा ने मुस्कान के साथ हर रस्म निभाई, लेकिन उसके भीतर एक मजबूत संकल्प आकार ले रहा था।
ससुराल में प्रवेश करते ही नेत्रा ने पहला कदम अपने पूजा कक्ष की ओर बढ़ाया। उसने वह दिव्य मूर्ति, जो नयनतारा ने उसे दी थी, स्थापित की और श्रद्धापूर्वक उसकी पूजा की। उसे महसूस हुआ जैसे उस मूर्ति से अदृश्य ऊर्जा निकल रही हो, जो उसकी आत्मा को संबल दे रही थी। नेत्रा ने मन ही मन ठान लिया कि वह इस नए जीवन में हर जिम्मेदारी को निभाएगी, चाहे रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो। उसके पास अब नागलोक का आशीर्वाद और अपनी दिव्यता का सहारा था।
आने वाले दिनों में नेत्रा को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ससुराल की नई जिम्मेदारियाँ, नए रिश्ते, और संसारिक जीवन की जटिलताएँ उसे कभी-कभी विचलित कर देतीं, लेकिन हर बार जब वह उस मूर्ति के सामने बैठती, उसे ऐसा लगता कि नागलोक की समस्त शक्तियाँ उसे गले लगा रही हैं। नयनतारा के शब्द उसके कानों में गूंजते, और वह खुद को पहले से भी अधिक सशक्त महसूस करती।
नेत्रा के मन में अब कोई डर नहीं था। वह जान चुकी थी कि चाहे कोई भी मुश्किल आ जाए, वह उसे पार कर लेगी। उसकी आत्मा में अब एक नयी उम्मीद और आत्मविश्वास की लौ जल चुकी थी।



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