अध्याय १९: नेत्रा की समृद्धि और एक पिता का द्वंद्व
नेत्रा का जीवन अपने गाँव में सादगी और शांति से व्यतीत हो रहा था। वह एक साधारण दिनचर्या में मग्न थी — सुबह खेत में काम, फिर अपने घर के कार्यों में लगना, और दिन ढलते ही परिवार के साथ समय बिताना। समय ऐसे ही बीत रहा था, जब गाँव में धीरे-धीरे बारिश ने आना बंद कर दिया। खेतों की हरियाली मुरझाने लगी, और सूखे की मार ने पूरे गाँव को बंजर बना दिया। हर किसान के खेत में फसलें सूख रही थीं, और सभी लोग प्रकृति के क्रूर खेल से हार मान चुके थे। लेकिन इस कठिन समय में नेत्रा का खेत अब भी हरा-भरा था। फसलें जैसे किसी दिव्य प्रकाश से सराबोर होकर लहलहा रही थीं। गाँव के लोग चकित थे — क्या यह कोई चमत्कार था?
लोगों में कानाफूसी शुरू हो गई कि नेत्रा के खेत में क्या खास था। वहाँ की मिट्टी वही थी, पानी वही था, लेकिन फिर भी नेत्रा की फसलें कैसे इतनी समृद्ध थीं? कुछ लोग इसे नेत्रा की भाग्यशाली किस्मत मान रहे थे, तो कुछ इसे दैवीय कृपा का चमत्कार। लेकिन सच्चाई इससे कहीं परे थी। नेत्रा के पिता, शेखर, जो वास्तव में नागराज वज्राक्ष थे, ने गुप्त रूप से अपनी दिव्य शक्तियों का उपयोग किया था। उसने नेत्रा के खेत को अपने नाग-संतानों से संरक्षित करवा रखा था। ये नाग-रूपधारी संताने रात में खेत की देखभाल करतीं, और दिन में मानव रूप में मजदूरों का भेष धरकर खेतों में काम करतीं। नेत्रा को इसका आभास भी नहीं था कि उसके खेत की समृद्धि उसके पिता के अदृश्य संरक्षण का परिणाम थी।
शेखर, यानी वज्राक्ष, नेत्रा के प्रति अत्यधिक प्रेम महसूस करते थे, लेकिन उन्होंने कभी उसे अपनी असली शक्ति का पता नहीं चलने दिया। वे चाहते थे कि नेत्रा एक साधारण लड़की की तरह ही जीवन जीए, और जो भी धन-संपत्ति आए, वह अपने मेहनत और भाग्य से आए। हालाँकि, उन्होंने अपनी दिव्य शक्तियों का कभी व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग नहीं किया, लेकिन नेत्रा के प्रति उनका प्रेम ऐसा था कि वे कभी उसे किसी कठिनाई में नहीं देख सकते थे। यही कारण था कि जब गाँव सूखे से जूझ रहा था, नेत्रा का खेत हरा-भरा रहा।
इस बीच, गाँव में एक नया मोड़ आया। एक ज्योतिषी और विवाह प्रस्तावक, देवीप्रसाद, गाँव में आया। वह नेत्रा को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। नेत्रा की सादगी और स्वाभाविक सुंदरता ने उसे अपनी भतीजी के लिए एक उत्तम वधू के रूप में देखना शुरू कर दिया। उसने सोचा कि उसकी भतीजी प्रकाश, जो एक विद्वान और संस्कारी बालक था, नेत्रा के लिए बिल्कुल सही होगा। देवीप्रसाद ने प्रस्ताव रखने के लिए तुरंत वज्राक्ष से संपर्क किया और नेत्रा का हाथ मांगने का प्रस्ताव दिया।
जब देवीप्रसाद ने वज्राक्ष से कहा कि प्रकाश एक योग्य वर है — साधारण, आज्ञाकारी और विद्वान — वज्राक्ष ने इसे ध्यान से सुना। उन्होंने महसूस किया कि अब समय आ गया है जब नेत्रा के विवाह की जिम्मेदारी उन्हें निभानी होगी। उन्होंने देवीप्रसाद से कहा कि वह इस प्रस्ताव पर विचार करेंगे, लेकिन पहले वे प्रकाश से मिलना चाहेंगे। यह सुनकर देवीप्रसाद आश्वस्त हो गया और वज्राक्ष से वादा किया कि वह जल्द ही प्रकाश को उनसे मिलवाने लाएगा।
वज्राक्ष जब घर लौटे, तो उनके मन में उथल-पुथल मची हुई थी। उन्होंने अपनी पत्नी चंदा, यानी दिव्याक्षी से यह बात साझा की। दिव्याक्षी ने समझते हुए मुस्कुराया और वज्राक्ष को सांत्वना दी। "यह स्वाभाविक है, वज्राक्ष। एक दिन हर बेटी का विवाह होता है। यह हमारा सौभाग्य है कि हमें नेत्रा जैसी बेटी का कन्यादान करने का अवसर मिला है। तुम इसे आशीर्वाद के रूप में देखो।"
वज्राक्ष के मन में अब भी नेत्रा के बिना जीवन की कल्पना से भारीपन था। वह उसे अपने जीवन का एक अभिन्न हिस्सा मानने लगे थे। नेत्रा उनके लिए केवल एक जिम्मेदारी नहीं थी, बल्कि एक गहरी भावनात्मक कड़ी बन चुकी थी। उन्हें यह विचार बहुत कठिन लग रहा था कि नेत्रा का विवाह हो जाएगा और वह किसी और के घर की हो जाएगी। यह विचार उनके लिए असहनीय था, लेकिन फिर भी, उन्होंने अपने दिल में यह स्वीकार कर लिया कि यह समय अब आ चुका है।
धीरे-धीरे, नेत्रा के विवाह की तैयारियाँ शुरू होने लगीं। गाँव भर में उसकी चर्चा हो रही थी — एक भाग्यशाली लड़की, जिसने सूखे के समय में भी समृद्धि पाई थी, अब एक योग्य वर के साथ विवाह करने जा रही थी। वज्राक्ष ने अपनी भावनाओं को संभालने की पूरी कोशिश की, ताकि वह नेत्रा के लिए एक सशक्त और आदर्श पिता बन सकें।

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